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पुनर्जन्म की ये कहानी जो आपको हैरत में डाल देगी! rebirth story book in hindi by लेखिका :- विमला मीणा

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              पुनर्जन्म      

नीयत (कहानी संग्रह)     लेखिका :- विमला मीणा


गांव-गांव, गली-गली, घर-घर में यही चर्चा का विषय था कि
कुदरत का करिश्मा अनुपम, अनोखा और लाजबाव है जिसे कोई नहीं
जान सकता विधि का विधान" जिसे ना आज तक कोई डिगा सका है।
ना ही आगे सम्भव है वह अडिग है जब जो होना है वह होना ही है।
ईश्वर के आगे कोई राज-राज रह जाये तो उसकी सत्ता का
क्या? उसके भय का क्या? इसके नाम के आगे प्रश्न-चिन्ह लगे उसका
क्या? वह अपना करिश्मा समय-समय पर दिखाता आया है मझे तो मेरी
मा ने बताया आपको भी आपके किसी बड़े बुजर्ग ने बताया होगा, एक
बार जंगल में एक नितान्त अकेला व्यक्ति एक गाय को मार आता है और
यही सोचकर चुप रहता है कि उसे किसी ने नहीं देखा, वह भूल जाता है
ईश्वर के उन नेत्रों को जिसके लिए हर चीज पारदर्शी है और आकर उस
चबुतरे पर बैठ जाता है जहां पंच अपना निर्णय सनाते है तभी देखता है।
वही गाय और कुछ गायों के साथ उसी ओर चली आ रही है वह कहता
"
अरे! ये क्या इस गाय को तो मैं कुछ देर पहले मार आया था ये कैसे
जिन्दा हो गई" वहां बैठ लोगों में से आवाज आती है कौनसी? और वह
एक पत्थर उब उसी गाय का देकर बताता है ये बाली, तभी गाय मर जाती
है।
सबने देखा कि माय मर गई उसका अकेले में किया गया वह
प्रणित कार्य बिमा सका, यही है ईश्वरीय महिमा इंसान को गनाह।
करने से पहले जान लेना चाहिये कोई है जिसकी आखें हमें हर पल हर
समय देखती रहती है। वह जब चाहें मिटा दे, जब चाहे बना दे इंसान है
या उसकी राष्टिका अंश-मात्रा आज भी जहां तक ये बात जायेगी
स्वर की सत्ता का अटूटबन्धन (जो आत्मा-परमात्मा है) उससे जुड़ा है
सबकी जुबां पर होगा। क्या ऐसा भी हो सकता है? लगता है भगवान
निर्णय करने, न्याय देने स्वयं धरा पर मानव रूप में इस कलयुग में आये
कितना प्रेम था दोनों के बीच इतना खून के रिश्तों में भी नहीं
मिलता, ना ही जाति का बंधन, ना ही अमीरी, गरीबी का भेद-आव उनके
मनों का मिलान ही उनके प्रेम का सार था। एक नाले के इस पार और
एक नाले के उस पार, एक ठाकुर लाखन सिंह तो दूसरा रघुवीर दोनों को
ही अपनी-2 घोड़ी से गहरा लगाव था। लाखन सिंह दिन निकलते ही
नाले के इस पार आ जाता और दोनों कभी घंटों पीपल तले बैठते तो कभी
नीम तले, साथ-2 नहाते, कभी दौड़कर पेड़ों पर चढ़ जाते तो हाथ
पकड़कर एक साथ कूदते, पता ही नहीं चलता दिन कब छिप जाता ।
एक ही थाली में खाना एक दूसरे के बाहों में लटकते झूलते कब
कहां निकल जाते कोई नहीं जानता। छल कपट से दूर बचपन होता ही।
इतना सुखद है कि पता नहीं चलता बाल्यकाल का समय कब निकल
जाता है वो निश्छल प्रेम, निडर, बिना थके चलते रहना, चलते-चलते वे
कहां पहुंच गये कि यौवन ने उनकी जिन्दगी में कब दस्तक दे दी पता ही
नहीं चला, जैसे-2 वो जवान होने लगे दोस्ती में ओर प्रगाढता आती ही
चली गई लेकिन वो छोटी-छोटी जिम्मेदारियां भी उन्हें मिलने लगी थी
जिससे एक-दूसरे को इतना वक्त नहीं दे पाते थे।
वक्त ही है वो जिसके पास किसी के लिए वक्त नही, वो किसी
के लिए पल-भर ठहर जाये लगता नही ऐसा होता है क्योंकि वक्त का
रुकना ही स्थिरता है। परिवर्तन ही प्रकृति का अभिन्न अंग है। प्रकृति का नीयत (कहानी संग्रह
ही क्यों सभी जीव-जन्तुओं की जिन्दगी भी परिवर्तनशील है। अपरिवर्तन
जिन्दगी में नीरसता लाता है जिन्दगी अवसाद हो जाती है। वहीं जीवन
की उमंगे तरंगे और उत्साह दम तोड़ने लगता है।
रघुवीर का विवाह भी इसी परिवर्तन का हिस्सा है। रघुवीर अपनी
परिणिता (शांति) से बहुत खुश है वह गांव के थोड़ी ही दूर नाले के पास
वाले खेतों में बाड़ी लगाता है और अपना जीवन बसर करता है दोनों
अपनी संयमित जिन्दगी में बेहद खुश है वो हरियाली-भरा वातावरण, वो
शुद्ध प्राकृतिक हवा, दूर दिखती पहाड़ी, पेड़ो पर चिडियों की चहचहाहट,
घोड़ी की हिनहिनाहट, यही अब बातों के बीच वह अपने और लाखन की
दोस्ती की बातें भी शांति से करता रहता है। इधर लाखन ने अपने पिता
के कारोबार में हाथ बटा लिया है जिसके तहत उसका शहर आना-जाना
लगा रहता है। लाखन जब भी शहर आता-जाता कुछ देर रघुवीर के घर
विश्राम करता और अधिक रात होने पर वो नाला पार नहीं करना चाहता
और रघुवीर के घर ही ठहर जाता।
यही सिलसिला चलता रहता है कभी-2 रघुवीर के ना होने पर
भी शांति लाखन को बच्चे की भांति स्नेह से देखती और यही सोचती
आखिर कितना बड़ा हृदय है इनका, हम गरीबों के लिए ऐसा निश्चल
प्रेम! मन ही मन ऐसी औलाद का ख्याल अपने मन में लाती है। तीन
बरस व्यतीत होने पर भी शांति मां नहीं बन सकी। इसका मलाल उसे
हमेशा रहता, वह यही सोचती नारी की सम्पूर्णता उसके मां बनने में ही
निहित है। राम जाने, यह सुख उसे कब मिलेगा फलदार वृक्ष गर फल
ना दे तो क्या, वह सार्थक है? नारी जीवन भी बिना संतान रूपी रत्न के
निरर्थक ही है। कौन जाने किस शुभ घड़ी का सोचा हुआ फलित हो जाये।
इसका लेखा-जोखा तो मानस-पटल पर छठी के दिन ही अंकित कर दिया
जाता है। सावन का महिना प्रकृति को दिया हुआ ईश्वरीय वरदान है।
जिसमें धरा हरियाली रूपी चादर ओढ़कर सोलह श्रृंगार करती हुई। नीयत (कहानी संग्रह
नदी-नालों में कल-कल शोर करती लहरों में बलखाती झीगुरों की पायल
पहन मेक की भांति फुदक-फुदक कर मोर-पपीहे कोयल के सुरों में
ताल मिलाकर हवा से बजते पत्तों से मोहक हो उठती है।
प्रकृति का ये मनभावन कप बड़ा मनोहर होता है जिसे देखकर
मन व्हरसा जाता है जिसका एहसास रघुवीर के घर आंगन से लिया जा
सकता है लाखन को हवेली के वातावरण से बेहतर अपने दोस्त रघुवीरका
आंगन लगता है। कुछ ही चीजें है जिन्हे लाखन अपने से ज्यादा प्यार
करता है। वह अपनी दोस्ती के खातिर अपनी जान भी दे सकता है यही
वजह है कि वह अपनी घोड़ी हंसा की देखभाल भी स्वयं ही करता है।
ईश्वर को कब क्या मन्जूर है कोई नहीं जानता, आज कई दिनों
के बाद लाखनसिंह शहर से लौटा है बरसात की हल्की-हल्की फुहारें आ
रही है। मेंढ़क टर्र-टर्ट कर रहे है सावन-भादों की अधियारी रात का भी
क्या कहना आसमान में कभी-2 बिजली चमकती और गुम हो जाती है।
यही सब देखकर लाखन आज की अपनी रात रघुवीर के साथ बिताना
चाहता है और वहां आकर रूक जाता है। शांति घोड़ी को चारा डालती है।
अपनी नोटों से भरी थैली रघुवीर को दे, वह चारपाई पर लेट जाता है,
शांति घोड़ी को चारा डाल अंदर जाती है तो देखती है कि रघवीर उन नोटों
को हसरत भरी निगाहों से देख रहा है।
वह ध्यान न देकर लाखन को खाना खिलाती है। लेकिन विधि का
लेखा जोखा बदलना हम इंसानों का क्या ? देवताओं से भी परे है जब
कछ भी अनर्थ ईश्वर को करना होता है तो सरस्वती मंथरा की भांति
मन-मानस पर छा जाती है फिर इंसान वही करता है जो विद्या की देवी
को मंजर होता है। आखिर में अंधियारें की जीत होती है जो रघुवीर अपने
दोस्त के खातिर जान दे सकता है आज वही उन रूपों के खातिर उसकी
जा लेने का षडयंत्र रचता है। रघुवीर अपनी पत्नी शांति को पास बुलाकर
उसे बताता है इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा अमीर बनने का। शांति इंकार कर देती है। नारी-सुलभ कोमलता और भावना की प्रतिमूर्ति होती
वह प्रेम की पविक हो सकती है ऐसे घृणित कार्य में साझेदारी जल्दी
से कैसे दे सकती है वह रघुवीर को ऐसा निन्दनीय कृत्य करने से रोकती
है, अपने जीवनसाथी के नहीं समझने पर वह लाखनसिंह को सब कुछ
बता देने की धमकी दे बाहर निकल आती है। वह लाखन सिंह को कुछ
कह पाती उससे पहले हि रघुवीर तलवार लिए आता है वह लाखन पर वार
करता लेकिन लाखन झट से घोड़ी पर बैठ नाले की तरफ निकल जाता है।
रघुवीर उसका पीछा करता है इस अंधियारी रात में बिजली की
चमक से पता चलता है कि दोनों के बीच कितनी दूरी है। नाले के आते
ही लाखन सिंह की घोड़ी हंसा उसमें उतरने से इंकार कर देती है।
लाखनसिंह की तमाम कोशिशों के बावजूद घोड़ी उसे नाला पार नहीं
करवाती है तभी पीछे से रघुवीर लाखन पर वार कर देता है। कुछ ही देर ।
में लाखन सिंह के प्राण पखेरु उड़ जाते है। रघुवीर उसकी लाश को
कई-टूकड़ों में काटकर नाले के तेज बहाव में बहा देता है।
कुछ देर वह वहाँ खड़ा रह ना जाने क्या सोच उसकी घोड़ी का भी
वही हाल करता है। जब यह सब कुछ शांति को पता चलता है वह ठगी
सी रह जाती है, वह रोना चाहती है पर से नहीं पाती। उसकी आवाज भी
जाने हंसा और लाखन के साथ ही चली जाती है। इंसान के नक्षत्र साथ
ना दे तो सब कुछ उल्टा होने लगता है प्रकृति का चक्र उसके लिए दिशा
बदल लेता है। तभी तो हमेशा नाला पार कराने वाली हंसा भी रघुवीर का
साथ देती है और लाखन को नाला पार नहीं करवाती।
(
समय बीतता जाता है सूर्य और चन्द्र हमेशा की भांति छिपते
और निकलते है शांति के दुखों के दिन छटने लगे है इसी खुशी के साथ
वह मां बनने वाली है) नारी त्याग-तपस्या की मूर्ति होती है पति का साथ
देना वह अपना कर्तव्य समझती है सब-कुछ जानकर भी वह अनजान
बनी बैठी रही. लोगों में लाखन की अचानक गुमशुदगी के लिए तरह-2 की अफवाहें उठती और बैठती रहती है। कोई कहता है लाखन शहर में
किसी ने मार दिया, कोई कहता शायद उसे कोई ले गया हो, लेकिन
रघुवीर पर किसी का शक नहीं जाता। कुछ समय बीतने पर वह उस पैसे
से व्यापार करता है जिससे उसे काफी लाभ मिलता है वह अपने पैसों का
सदुपयोग करना जान गया है।
एक-एक करके दिन गुजरते गये और सावन की अंधियारी रात
आज शांति के घर रोशनी करने के लिए उसके माथे पर लगे बांझपन के
तिलक को मिटाने के लिए उसके घर का चिराग दिये जाती है, शांति बहुत
खुश है पुत्र पाकर रघुवीर भी बहुत खुश होता है और अपने हाथों से
मिठाइयां बांटता है वह यह भी भूल जाता है कि आज ही के दिन उसने।
अपने दोस्त की जा भी इन्ही हाथों से ली थी। वक्त अपनी ही चाल
अविरल गति से चलता रहता है और शांति का चिराग भी वक्त के साथ
वाल मिलाते हुए बढ़ता रहता है शांति और रघुवीर को पता भी नहीं चलता
देखते-देखते उनका चिराग 7-8 साल का हो जाता है।
रघुवीर यह देखकर हैरान हो जाता है कि चिराग वही सब करता।
है जो बचपन में लाखनसिंह किया करता था और रघुवीर से भी जिह
करता है कभी पेड़ो पर चढ़ने की तो कभी भागकर पीपल को छू लेने की।
रघुवीर की जिन्दगी में भूचाल सा आ जाता है जब वह सुनता है कि चिराग
स्वपन में वही देखता है जो आज से 8-10 साल पहले उसकी जिन्दगी
से गुजर गया। वह कहता है दादा मुझे लगता है जैसे तलवार लिए कोई
मेरा पीछा कर रहा है मैं सही नहीं देख पाता इससे पहले मेरी निद्रा टूट
जाती है। यह सुनकर रघुवीर के होश फाख्ता हो जाते है। वह चिराग को
गांव के माहौल से दूर शहर पढ़ने भेज देता है।
चिराग शहर में खुश नहीं रहता। व्याकुल और बैचेन महसूस
करता है। वही धुंधला सा स्वप्न जिसमें स्पष्टता नहीं होती आ-आकर उसे
ये सोचने पर मजबूर करता है आखिर ये क्या है? एक ही स्वप्न बार-2 आखिर एक रात वह पूरा व स्पष्ट स्वप्न देखता है। स्वपन का उसके
मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है जब वह उसका स्पष्टीकरण अपने ही
प्रतिबिम्ब में देखता है तो उसे महसूस होने लगता है कि वह मैं ही हूँ
जिसका पीछा रघुवीर कर रहा है वह सब-कुछ जान जाता है। अपनों के
प्रति उसके मन में नफरत पैदा हो जाती है। वह ईश्वरीय महिमा का मन
ही मन गुणगान करने लगता है। वह जान जाता है कि उसके जन्म से
पूर्व उसकी कोई कहानी है नियति के खेल भी निराले होते है कब चित्त
को पट और पट को चित्त करदे कोई जानता है भला?
उसका मन शिक्षा में न लगकर भटक जाता है और गलत दोस्तों
की सह पाकर वह गलत रास्ते पर चल देता है शराब पीना कोठों पर जाना
उसकी दिनचर्या बन गयी है अब दोस्तों में भी उसकी अहमियत अमीर-बाप
के बिगडैल बेटे के अलावा कुछ भी नहीं। एक दिन गांव में रघुवीर को
संदेश मिलता है कि चिराग की तबीयत ठीक नहीं है रघुवीर अपने गुलशन
के फूल को सहेजने के लिए शहर चला आता है मगर उसकी आदतों के
बारे में सुनकर बहुत दुखी होता है और उसका बोरिया-बिस्तर उठा गांव
ले आता है। गांव आकर चिराग बेहद-दुखी रहता है। अपने चिराग को
बुझा-2 सा देख शांति, रघुवीर से उसका विवाह करने को कहती है।
रघुवीर चिराग को पास ही के गांव में किसी कार्यवश भेजता है
वही राह में उसकी मुलाकात रेवती से होती है जिसे देख चिराग का सिर
चकराने लगता है रेवती की शक्ल में उसे उसकी पूर्व जन्म की घोड़ी
दिखाई देती है वह सोचने पर मजबूर हो जाता है क्या बाकई ऐसा ही है।
वह उसके बारे में जान-पहचान कर वापस लौट आता है और चुपचाप
चारपाई पर लेट जाता है। आज रघुवीर उसकी उदासी की बजह जानना
चाहता है लेकिन ऐसा क्या कहता है चिराग जिससे रघुवीर दहल जाता
है उसे आत्म ग्लानि महसूस होती है। वह जान-जाता है कि यही लाखन
है जो मेरे यहां पुत्र बनकर आया है। रघवीर अपने को लाचार और वेबस महसूस करता है वह घूमता-2 उसी नाले के पास नीम तले बैठ जाता है
जहां वर्षों पहले वह लाखन के साथ बैठा करता था।
आज उसे लाखन की याद आती है वह आत्मग्लानि से भर उठता
है। वह जानता है जो समय निकल चुका है लाख जतन करी हारू तो भी
नहीं लौट सकता। इसी पाप को लिए वह मंदिर पहुंच जाता है जहां
उसका सामना भगवान से होता है। भगवान ईश्वर, आस्था में होता है,
हृदय में होता है पत्थर की मूरत सिर्फ एकनिष्ठता के लिए होती है रघुवीर
जान गया था। उसने विश्वास का, धर्म का खून किया। इससे बड़ा पाप
शायद ही दूसरा हो। अपने ही जाल में वह इस तरह फंसता है कि
छटपटाने के अलावा कुछ नहीं रह जाता। नियति के आगे कब कहां किसी
का वश चलता है वह पश्चाताप की अग्नि में जलता रहता है वह अपने
ही पुत्र से पराया हो जाता है। सुख-चैन उसकी जिन्दगी से नदारद हो गये
है। वह थका हारा घर लौट आता है जहां शांति उसे बताती है कि चिराग
जमींदार की लड़की रेवती से शादी करना चाहता है।
रघुवीर चिराग को हर खुशी देना चाहता है इसलिए वह उसका
विवाह रेवती से करा देता है। चिराग अब कुछ खुश है जैसे उसकी मन
की साथ पुरी हो गयी है। शांति इन सब बातों से अनजान बेहद खुश है।
हां कभी-अकेले बैठे-2 उसे लाखन की याद आती है तो चेहरा बुझ सा
जाता है। चिराग का ध्यान कभी पड़ जाये तो पूछ बैठता है क्या हुआ मां।
लेकिन शांति बात टाल जाया करती है। चिराग की तबीयत बिगड़ती.
संवरती रहती है। शादी को साल भर व्यतीत हो जाता है। रघुवीर मन ही
मन पश्चाताप की अग्नि में जलकर सूखता जाता है। एक दिन चिराग की।
तबीयत ज्यादा खराब हो जाती है शहर ले जाने पर भी महीनों तक चिराग
सही नही होता है तो डॉक्टर उसे छुट्टी दे देते हैं।
चिराग जानता है कि वह अब कुछ दिनों का मेहमान है गांव आते
ही उसकी सांस फूलने लगती है। सब बेहद परेशान और दुखी है शांति का रो-रोकर बुरा हाल है। विराग अपनी मां से कहता है। मैं से ऊपर
लगा बांझ का कलंक धोने आया था, इससे ज्यादा तेरे लिए कुछ और
नही कर सका। अपने पिता रघुवीर से मैंने अपना सारा पैसा सूद समेत
खर्च करवा दिया आज तुम वहीं हो जहां 20 साल पहले थे। मैं ही लाखन
हूँ जिसे तुम अपनी रही सही जमीन जायदाद बेचकर भी बचाना चाहते
हो। सिर्फ इतना सा फर्क है पहले विश्वास का रिश्ता था अब खून का।
तभी रेवती फपक-फपक कर रो पड़ती आखिर मेरा क्या कसूर
है? मुझे इस अंवर में अकेला क्यों छोड़कर जा रहे हो, मुझे इस तरह
मझधार मैं ना छोड़ों। चिराग मलीन हंसी हंसता है और यही कहता है।
पिछले जन्म में तुम मेरी घोड़ी हंसा हुआ करती थी। तुम्हें ये सब याद ना
रह सका लेकिन मुझे तुम्हारे चेहरे में मेरी घोड़ी हंसा दिखाई दी। मैनें तभी
मन ही मन निश्चय किया कि मुझे तुमसे ही शादी करनी है क्योंकि मुझे
एहसास है कि मेरा अन्त निश्चित है मेरा जन्म लेना ही भगवान का
स्पष्टीकरण है कि कोई है जो हमें हर पल-हर क्षण देखता है हमारे
पाप-पुण्य का साक्षी। रेवती अगर तुम चाहती तो मुझे हमेशा की भांति
नाला पार कराकर मेरी जान बचा सकती थी लेकिन उस पाप में तुम
बराबर की भागीदार हो, कर्मो का फल भुगतना ही है चाहे देर से ही सही
कहते है ना भगवान के घर देर है मगर अंधेर नहीं"।
लोगों को जब पता चला कि चिराग ही लाखन है 20 साल बाद
लोगों का लाखन का अचानक गुम हो जाने का रहस्य समझ आया। सब
मिल कर भगवान का जयकारा करते है इधर चिराग अपना शरीर त्याग
कर परमपिता के सानिध्य में चला जाता है। रघुवीर जिसके घर को लोगों
ने जात बाहर कर दिया उससे पहले ही उसका मानसिक संतुलन खो
जाता है और वह पागलों की भांति लोगों की ठोकरें खाता कुछ समय बाद
यह भी नहीं पता चला कि आखिर वह कहां गया।
लेकिन भगवान कल या आज है हमेशा रहेगा एक वही तो है जो
आगाज है और अंत भी।




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